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जय माताजी की सा खम्मा घणी सा बन्ना, बाईसा दादोभाईसा,काकोसा,बाबोसा हुकम नै। , we provide all information about rajputs .
Jul
27

Maharana pratap story in hindi

by , under Maharana pratap

पढ़िए स्टूडेन्ट्स क्यासीखते है प्रताप
के व्यक्तित्व से..

Maharana Pratap Painting

Maharana Pratap

1. प्रताप की कद काठी असामान्य थी। जंगलों, बीहड़ों में दिन
रात दौडऩे पर नहीं थके। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यूथ को अपने
शारीरिक विकास की तरफ ध्यान देना होगा। स्वस्थ तन
रहेगा तो मन भी स्वस्थ रहेगा। शरीर को नुकसान पहुंचाने वाले
खाद्य पदार्थों से बचें। प्रताप ने अपने शरीर
को जंगलों बीहड़ों में काफी थकाया, तभी वे सुडौलथे। युवाओं
को भी चाहिए कि वे नियमितव्यायाम से शरीर को स्वस्थ ओर
तंदुरूस्त रखने का प्रयास करें।

Weapons of Rana Pratap
2. प्रताप के अस्त्र विशेष रूप से भाला।
इतना भारी था कि आजउसे आसानी से उठा नहीं सकते। वे एक
हाथ से चलाते थे। शरीर, व्यक्ति का सबसे बड़ा सेवक है। जैसे
काम में लेंगे वैसे काम करेगा। प्रताप के अस्त्र भारी थे, लेकिन
उनके शरीर का संचालन दिमाग की गहराइयों से होता। मन में
जीत का जज्बा शामिल होने से सब हल्का हो जाता है। यूथ
को भी चाहिए कि वे अपने भीतर की शक्ति और उसके इस्तेमाल
की विधि को खोजें।

Maharana Pratap Horse Chetak 
3. चेतक की वफादारी। जख्मी होकर भी प्रताप की जान
बचाई। चेतक की वफादारी और प्रताप की संचालन शक्ति से
हमें सीखना होगा। जीवन के किसी क्षेत्र में साख बनाए रखने
के लिए संचालन शक्ति और कर्तव्यनिष्ठा की भावनाबेहद
आवश्यक है। युवाओं को विशेष रूप से इन दोनों गुणों को अपने
जीवन में उतारना होगा। जो उनके कॅरियर में भी काफी हद तक
सहायक होंगे।
4. जंगल में रहे, घास की रोटी खाई, लेकिन प्रताप ने
स्वाभिमान नहीं खोया। युवाओं को प्रताप के इस जुझारूपन से
सीख लेनी चाहिए कि उन्होंने अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए
सारी सुख सुविधाओं का त्याग किया। एक तरह से यहप्रताप
का रिर्सोस मैनेजमेंट था। पर्याप्त संसाधन नहीं होने पर
भी अपने लक्ष्य की पूर्ति करना। घास की रोटी खाना एक
उदाहरण है। प्रताप का रिर्सोस मैनेजमेंट काफीप्रभावी था।

Ally of Rana Pratap 
5. सांप्रदायिक एकता। भामाशाह, राणा पूंजा और हकीम
खां का मिला था साथ। जब हम किसी लक्ष्य को प्राप्त
करना चाहते हैं तो उसमें सहयोग लेना और देना स्वाभाविक है।
लीडर एक होता है, लेकिन उसके पीछे पूरी टीम होती है। टीम में
योग्य पहले और उसके बाद कमजोर होते हैं, लेकिन वोटीम
ही कहलाती है। किसी को कमजोर होने के कारण टीम से बाहर
नहीं किया जा सकता है।

!! जय जय राजपुताना !!
!! जय महाराणा हुकुम की !!

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2 Comments for this entry

  • kuwar jeetu

    सिंहों का सिंह, शूरवीरों का शूरवीर, स्‍वाभिमान का सम्राट , राजपूतों एवं भारत देश का गौरव, महातेजस्‍वी परम पराक्रमी , शौर्य प्रताप, मेवाड़ का सूर्य महाराणा प्रताप ।
    ग्‍वालियर के तोमर राजवंश के महाराजा रामसाय सिंह तोमर , अपने रिश्‍तेदार महाराणा प्रताप की ओर से हल्‍दीघाटी के मैंदान मे लड़े, ग्‍वालियर 20 जून 10, इस वर्ष 18 जून को हल्‍दी घाटी युद्ध की 425 वीं वर्ष गांठ थी । हल्‍दी घाटी के मैदान में महाराणा प्रताप के साथ महाराणा प्रताप की ओर से युद्ध करते हुये ग्‍वालियर के तत्‍कालीन महाराजा रामशाह सिंह तोमर अपने तीन पुत्रों व एक पौत्र (नाती) के साथ वीरगति को प्राप्‍त हो शहीद हो गये थे । हल्‍दीघाटी के मुख्‍य मैदान में मेवाड़ के तत्‍कालीन शासक महाराणा प्रताप के पौत्र महाराजा कर्ण सिंह ने महाराजा रामशाह सिंह तोमर (तंवर) और उनके पुत्रों व पौत्र की छत्रियॉं (स्‍मारक) उसी स्‍थान पर रक्‍त तलैया – खणमौर में निर्मित कराये , यह स्‍थान हल्‍दी घाटी का मैदान , उदयपुर राजस्‍थान के निकट है । झाला मान सिंह ने महाराणा का बाना व वेशभूषा धारण कर महाराणा प्रताप को युद्ध से निकाल दिया, तोमर महाराजा रामशाह सिंह तोमर की फौज ने हल्‍दी घाटी युद्ध पर लगभग विजय प्राप्‍त कर ली थी और अकबर की फौज की कई टुकडि़यों को वापस भागने पर मजबूर कर दिया किन्‍तु झाला मान सिंह द्वारा महाराणा प्रताप को युद्ध क्षेत्र से बाहर हटा देने से युद्ध के परिणाम बदल गये और तत्‍कालीन ग्‍वालियर महाराज रामशाह सिंह तोमर अपने पुत्रों व पौत्र एवं फौज के साथ वीरगति प्राप्‍त होने तक युद्ध करते रहे । महाराज रामशाह सिंह तोमर के पुत्रों के नाम शालिवाहन सिंह, भवानी सिंह एवं प्रताप सिंह थे । हल्‍दीघाटी के मैदान में कुल 450 लोग शहीद हुये जिसमें अकेले ग्‍वालियर साम्राज्‍य के ही कुल 322 वीर तंवर (तोमर) राजपूत थे । महाराणा प्रताप ग्‍वालियर के तोमर राजवंश के रिश्‍तेदार थे । दिल्‍लीपति महाराजा अनंग पाल सिंह तोमर के पौत्र सुल्‍तानशाह (सुल्‍तानसाय) के बेटे अर्थात महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर के प्रपौत्र कंवर सिंह को चित्‍तौड़गढ़ के महाराजा राणा रतन सिंह सिसौदिया की राजकुमारी हेमावती ब्‍याहीं थीं । जिसके वंशज ग्‍वालियर महाराजा रामशाह सिंह तोमर थे । स्‍वयं महाराजा रामशाह सिंह तोमर की एक महारानी महाराणा प्रताप की बहिन थीं इस प्रकार महाराजा रामशाह सिंह तोमर स्‍वयं भी महाराणा प्रताप के बहनोई थे । महाराजा रामशाह सिंह तोमर और उनके पुत्रों व पौत्र की हल्‍दीघाटी में शहादत के बाद ग्‍वालियर के किले पर तोमर शासक की 101 महारानीयों ने कजराई तीज को जौहर किया । जिसके बाद से तंवर (तोमर) राजपूतों में कजराई तीज नहीं मनाई जाती । चित्र में शालिवाहन सिंह तोमर की छत्री (स्‍मारक) एवं शिलालेख, छत्री पर हुकुम साहब कर्नल वीरेन्‍द्र तंवर जी बैठे हुये हैं , यह दुर्लभ चित्र उन्‍हीं के द्वारा हमें प्राप्‍त हो सके हैं । शासकीय स्‍तर पर इस समाधि पर प्रतिवर्ष श्रद्धासुमन अर्पित किये जाते हैं ।

  • kuwar jitendra singh tomar

    सिंहों का सिंह, शूरवीरों का शूरवीर, स्‍वाभिमान का सम्राट , राजपूतों एवं भारत देश का गौरव, महातेजस्‍वी परम पराक्रमी , शौर्य प्रताप, मेवाड़ का सूर्य महाराणा प्रताप ।
    ग्‍वालियर के तोमर राजवंश के महाराजा रामसाय सिंह तोमर , अपने रिश्‍तेदार महाराणा प्रताप की ओर से हल्‍दीघाटी के मैंदान मे लड़े, ग्‍वालियर 20 जून 10, इस वर्ष 18 जून को हल्‍दी घाटी युद्ध की 425 वीं वर्ष गांठ थी । हल्‍दी घाटी के मैदान में महाराणा प्रताप के साथ महाराणा प्रताप की ओर से युद्ध करते हुये ग्‍वालियर के तत्‍कालीन महाराजा रामशाह सिंह तोमर अपने तीन पुत्रों व एक पौत्र (नाती) के साथ वीरगति को प्राप्‍त हो शहीद हो गये थे । हल्‍दीघाटी के मुख्‍य मैदान में मेवाड़ के तत्‍कालीन शासक महाराणा प्रताप के पौत्र महाराजा कर्ण सिंह ने महाराजा रामशाह सिंह तोमर (तंवर) और उनके पुत्रों व पौत्र की छत्रियॉं (स्‍मारक) उसी स्‍थान पर रक्‍त तलैया – खणमौर में निर्मित कराये , यह स्‍थान हल्‍दी घाटी का मैदान , उदयपुर राजस्‍थान के निकट है । झाला मान सिंह ने महाराणा का बाना व वेशभूषा धारण कर महाराणा प्रताप को युद्ध से निकाल दिया, तोमर महाराजा रामशाह सिंह तोमर की फौज ने हल्‍दी घाटी युद्ध पर लगभग विजय प्राप्‍त कर ली थी और अकबर की फौज की कई टुकडि़यों को वापस भागने पर मजबूर कर दिया किन्‍तु झाला मान सिंह द्वारा महाराणा प्रताप को युद्ध क्षेत्र से बाहर हटा देने से युद्ध के परिणाम बदल गये और तत्‍कालीन ग्‍वालियर महाराज रामशाह सिंह तोमर अपने पुत्रों व पौत्र एवं फौज के साथ वीरगति प्राप्‍त होने तक युद्ध करते रहे । महाराज रामशाह सिंह तोमर के पुत्रों के नाम शालिवाहन सिंह, भवानी सिंह एवं प्रताप सिंह थे । हल्‍दीघाटी के मैदान में कुल 450 लोग शहीद हुये जिसमें अकेले ग्‍वालियर साम्राज्‍य के ही कुल 322 वीर तंवर (तोमर) राजपूत थे । महाराणा प्रताप ग्‍वालियर के तोमर राजवंश के रिश्‍तेदार थे । दिल्‍लीपति महाराजा अनंग पाल सिंह तोमर के पौत्र सुल्‍तानशाह (सुल्‍तानसाय) के बेटे अर्थात महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर के प्रपौत्र कंवर सिंह को चित्‍तौड़गढ़ के महाराजा राणा रतन सिंह सिसौदिया की राजकुमारी हेमावती ब्‍याहीं थीं । जिसके वंशज ग्‍वालियर महाराजा रामशाह सिंह तोमर थे । स्‍वयं महाराजा रामशाह सिंह तोमर की एक महारानी महाराणा प्रताप की बहिन थीं इस प्रकार महाराजा रामशाह सिंह तोमर स्‍वयं भी महाराणा प्रताप के बहनोई थे । महाराजा रामशाह सिंह तोमर और उनके पुत्रों व पौत्र की हल्‍दीघाटी में शहादत के बाद ग्‍वालियर के किले पर तोमर शासक की 101 महारानीयों ने कजराई तीज को जौहर किया । जिसके बाद से तंवर (तोमर) राजपूतों में कजराई तीज नहीं मनाई जाती । चित्र में शालिवाहन सिंह तोमर की छत्री (स्‍मारक) एवं शिलालेख, छत्री पर हुकुम साहब कर्नल वीरेन्‍द्र तंवर जी बैठे हुये हैं , यह दुर्लभ चित्र उन्‍हीं के द्वारा हमें प्राप्‍त हो सके हैं । शासकीय स्‍तर पर इस समाधि पर प्रतिवर्ष श्रद्धासुमन अर्पित किये जाते हैं ।

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