मित्रों महाराणा प्रताप के स्वामी भक्त घोड़े चेतक के सम्मान में कुछ पंक्तियाँ पेश कर रहा हु ये आपने पहले भी सुनी होगी ,इसमें मैंने कुछ अपनी पंक्तियाँ भी जोड़ी है गलती हो तो क्षमा चाहूँगा !स्वामिभक्त चेतक जिसने अपने स्वामी की रक्षा में अपने प्राण त्याग कर खुद को इतिहास में अमर कर लिया ,ऐसे दिव्यात्मा को मेरा शत शत नमन !
चढ़ कर चेतक पर घूम-घूम
करता सेना रखवाली था
ले महा मृत्यु को साथ-साथ
मानो साक्षात् कपाली था

रण बीच चौकड़ी भर-भरकर
चेतक बन गया निराला था
राणा प्रताप के घोड़े से
पड़ गया हवा को पाला था

गिरता न कभी चेतक तन पर
राणा प्रताप का कोड़ा था
वह दौड़ रहा अरि मस्तक पर
या आसमान पर घोडा था

जो तनिक हवा से बाग़ हिली
लेकर सवार उड़ जाता था
राणा की पुतली फिरि नहीं
तब तक चेतक मुड़ जाता था
रणचंडी की जयकार कर
मानो बन गया कृपाला था
महाकाल का कर स्मरण
हल्दीघाटी रण का मतवाला था
स्वेत शरीर स्वेत आत्मा
अपने स्वामी का रखवाला था
महाप्रयाण की कर तैयारी
उसका वो तेज़ निराला था
राणा प्रताप के घोड़े से
पड़ गया हवा का पाला था !

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